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” Happy Valentine’s Day” !!

” Happy Valentine’s day !!
आज लोग वेलेंटाइन दिवस मना रहे हैं। यानि अपने प्रेमी के प्रति प्रेम को प्रकट करने का दिवस।

कहते है जिसे प्रेम हो जाए वह तो बावरा हो जाता है अपने प्रिय के प्रति दीवाना, मस्ताना, पागल, बेसुध और न जाने दुनियां जहा के नजर में कई नामों से नामचीन हो जाता है। देखा जाय तो प्रेम का दूसरा नाम विश्वास है और विश्वाश वही होता है जहां सत्यता का निवास होता है, प्रेम में वो शक्ति का संचार है जिसकी आसक्ति और लगाव ने सूरदास को कुंए से सर्प को रस्सी समझ पकड़ कर को पार निकल गया।

वैलेंटाइन डे, जिसे सेंट वैलेंटाइन डे या संत वैलेंटाइन पर्व भी कहा जाता है, हर साल 14 फरवरी को मनाया जाता है। इसकी शुरुआत एक ईसाई पर्व के रूप में हुई थी, जो संत वैलेंटाइन नामक शहीद की याद में मनाया जाता था। समय के साथ यह दिन प्रेम, रोमांस और आपसी स्नेह का प्रतीक बन गया।कहा जाता है कि तीसरी शताब्दी में रोमन साम्राज्य के दौरान संत वैलेंटाइन ने उन ईसाइयों की सेवा की जिन्हें सताया जा रहा था। एक कथा के अनुसार, उन्होंने अपने जेलर की अंधी बेटी की दृष्टि वापस दिलाई। बाद की लोककथाओं में यह भी माना जाता है कि संत वैलेंटाइन ने उन सैनिकों की गुप्त रूप से शादियाँ करवाईं जिन्हें रोमन सम्राट ने विवाह करने से मना किया था। एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार, फांसी से पहले उन्होंने जेलर की बेटी को एक पत्र लिखा था, जिस पर हस्ताक्षर था – “Your Valentine”। यही परंपरा आगे चलकर प्रेम पत्र और वैलेंटाइन कार्ड देने की शुरुआत बनी। आज वैलेंटाइन डे पूरी दुनिया में प्यार और रिश्तों का जश्न मनाने का दिन बन चुका है।

लेकिन भारतीय संस्कृति और समाजिक परंपराओं का चिंतन करे तो हम पाएंगे की प्रेम ब्रह्मांड की वह अलौकिक अनुभूति है, जो मानवीय जीवन में हर किसी के साथ बीतता है। वैसे प्रेम तो कई प्रकार के होते हैं, रिश्तों में प्रेम, मा बाप से प्रेम, भाई बहन का प्रेम, भाई भाई में प्रेम, दोस्ती में प्रेम, मासुक का प्रेम, पति पत्नी में प्रेम, माता पिता का बच्चो से प्रेम, शिक्षापार्जन के समय गुरु और शिष्य का प्रेम, भगवान से भक्त और भक्त का भगवान से प्रेम। सभी में अशक्ति, लगाव, विश्वाश और सत्यता की गोंद चिपकी रहती हैं, जिससे की अशक्ति और लगाव का संचार एक दूसरे में प्रवेश होता है। और यह विश्वास और इबादत बन सत्यता की छाप छोड़ जाता है।
ईश्वर भक्ति में भी प्रेम का बड़ा महत्व है। प्रेम ही जग में सबसे सार वस्तु है। संत कबीर साहब ने कहा- “प्रेम बिना जो भक्ति है सो निज डिंभ विचार, उद्र भरन के कारने जनम गँवायो सार”। यानि यदि भक्ति में प्रेम नहीं है तो वह सिर्फ खाने कमाने का धंधा बन जाता है।
ठीक यही बात गोस्वामी जी ने भी रामचरितमानस में लिखा-” प्रीति बिना नहीं भक्ति दृढ़ाई”।

सूफी संत परंपरा तो प्रेम को सर्वोपरि मानता है व प्रेम को ही ईश्वर का रुप मानता है । यहाँ भक्ति का अर्थ ही है- इश्कमजाजी (सांसारिक-प्रेम) से इश्कहकीकी (ईश्वरीय-प्रेम) की यात्रा, जहाँ प्रेम में फना हो जाना ही चरम ध्येय है। मलिक मुहम्मद जायसी ने पदमावत् में लिखा- “मानुष प्रेम भए बैकुंठी, नाहि तो़ काह छाड़ एक मुंठी।” यानि मनुष्य में प्रेम है तब तो ठीक नहीं तो वह एक मुट्ठी राख है।

संत कबीर साहब का अपने इष्ट के लिए प्रेम में विरह का वर्णन देखिए- “तलफै बिन बालम मोर जिया, दिन नहीं चैन रात नहीं निंदिया, तलफ-तलफ के भोर किया”।
संत सूरदास जी का पूरा भ्रमरगीत-सार भगवान कृष्ण के प्रति अलौकिक प्रेम के लिए ही समर्पित है, जब वे गोपियों के माध्यम के महाज्ञानी उद्धव को प्रेम का अर्थ समझाते हैं।

परम भक्तिन मीराबाई के प्रेम का तो शब्दों में वर्णन ही नहीं हो सकता, जब वो कहती हैं- “ए री मैं तो प्रेम दीवानी, मेरा दरद न जानै कोय”।
वहीं सुप्रसिद्ध कृष्ण भक्त रसखान जी हर जनम में ब्रज की माटी में ही आना चाहते हैं -“मानुष हों तो वहीं रसखानि बसों ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन”

प्रेम का अर्थ ही एकनिष्ठता व पूर्ण समर्पण से है। यानि प्रेम में अपनी कोई इच्छा ही नहीं रह जाती। जब भक्त ईश्वर की इच्छा में ही अपनी इच्छा विलीन कर देता है,यही नहीं वह ईश्वर के रुप को ही अपना रुप मानने लगता है। यानि हर दृष्टि से वह ईश्वर से खुद को एकाकार कर लेता है,कदाचित यही चरमावस्था है। इसी को रेखांकित करती हुई परमाराध्य सदगुरु महर्षि मेँहीँ की यह वाणी देखिए- “हे प्रेम रुपी सद्गुरु प्रेमी मुझे बना दो। ……तुम्हरा यह रुप जानूँ, अपना भी यही मानूँ। तुम हम दुई मिटाकर इक एक ही बना दिया।

पर विचारणीय बात यह है कि ऐसे समर्पण के लिए संसार से लगन/प्रेम बिल्कुल हटाना पड़ता है। इसलिए कहा गया- “जहँ काम तहँ राम नहीं…..।”

तो आइए आज हम भी अपने आराध्य के चरणों में प्रेम की लौ लगाएँ व खुद को ही उनके श्रीचरणों में न्योछावर करे।

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