
*सपनों को मिल रही उड़ान, दुर्ग की महिलाएं बन रहीं आत्मनिर्भरता की मिसाल
*योजनाओं से मिले अवसर और अपनी मेहनत से सफलता के सोपान पर आगे बढ़ती नारी शक्ति
*महतारी वंदन, लखपति दीदी और ड्रोन दीदी जैसी शासन की महत्वकांक्षी योजनाओं ने बदली महिलाओं की जिंदगी
दुर्ग। अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि समाज में महिलाओं की भूमिका, उनके संघर्ष और उनके सशक्तिकरण की यात्रा को सम्मान देने का अवसर है। आज की महिला केवल परिवार की जिम्मेदारियों तक सीमित नहीं है, बल्कि वह आर्थिक, सामाजिक और शैक्षिक क्षेत्रों में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा रही है। छत्तीसगढ़ सरकार महिलाओं को आत्मनिर्भर और सशक्त बनाने के उद्देश्य से अनेक महत्वपूर्ण योजनाओं का संचालन कर रही है। इन योजनाओं के माध्यम से महिलाओं को आर्थिक संबल, आत्मविश्वास और नए अवसर प्रदान करने का प्रयास किया जा रहा है।

इन योजनाओं में ’’महतारी वंदन योजना’’ विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इस योजना के तहत 21 वर्ष से अधिक आयु की विवाहित महिलाओं को प्रतिमाह 1000 रुपये की आर्थिक सहायता सीधे उनके बैंक खाते में प्रदान की जाती है। यह सहायता राशि महिलाओं के लिए केवल आर्थिक सहयोग नहीं, बल्कि उनके आत्मसम्मान और स्वावलंबन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। प्रदेश सरकार ने बजट 2026-27 में महतारी वंदन योजना के तहत 8,200 करोड़ का प्रावधान किया है। इस योजना के तहत प्रदेश की लगभग 70 लाख महिलाएं लाभान्वित हो रही
प्रदेश भर में महतारी वंदन योजना से महिलाओं के जीवन में सकारात्मक बदलाव स्पष्ट रूप से देखने को मिल रहे हैं। दुर्ग जिला भी इससे अछूता नहीं है। इस योजना की कई प्रेरणादायक कहानियों में ग्राम बोडे़गांव की 70 वर्षीय उमा बाई भी शामिल है। उमा बाई बताती हैं कि पहले उन्हें छोटी-छोटी जरूरतों के लिए भी परिवार के अन्य सदस्यों पर निर्भर रहना पड़ता था। कई बार कुछ रुपयों के लिए उन्हें लंबे समय तक इंतजार करना पड़ता था, लेकिन जब से उन्हें हर महीने महतारी वंदन योजना की राशि मिलने लगी है, तब से उनकी छोटी-छोटी जरूरतें आसानी से पूरी हो जाती हैं। अब उन्हें किसी के सामने हाथ फैलाने की जरूरत नहीं पड़ती।
इसी प्रकार ग्राम रानीतराई पाटन की निवासी श्रीमती शारदा नगारची भी इस योजना से बेहद खुश हैं। उन्हें हर माह मिलने वाली राशि से वे अपनी बेटी के नाम से बचत करती हैं और बच्चों की पढ़ाई-लिखाई में खर्च करती हैं। इससे उनके परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत हुई है और बच्चों की शिक्षा में भी सहयोग मिल रहा है।
जिले के बोरई गांव की संगीता यादव के जीवन में भी इस योजना ने नई उम्मीद जगाई है। पहले घर का पूरा खर्च उनके पति की मजदूरी पर निर्भर था, लेकिन अब महतारी वंदन योजना से मिलने वाली राशि से वे घर के आवश्यक सामान खरीदने में सहयोग कर पा रही हैं। इससे उन्हें आत्मनिर्भरता का अनुभव हो रहा है और परिवार के बजट में उनका भी योगदान बढ़ा है।
महतारी वंदन योजना ने केवल आर्थिक सहयोग ही नहीं दिया, बल्कि कई महिलाओं के सपनों को भी नई उड़ान दी है। दुर्ग की हितेश्वरी वर्मा का सपना शिक्षिका बनने का था, लेकिन जिम्मेदारियों के कारण उनकी पढ़ाई अधूरी रह गई थी। अब महतारी वंदन योजना से मिलने वाली राशि का उपयोग वे अपनी पढ़ाई और किताबों के लिए कर रही हैं। उनका कहना है कि इस सहायता से वे अपनी शिक्षा पूरी कर सकेंगी और भविष्य में बच्चों को पढ़ाकर समाज के विकास में योगदान देंगी।
महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने में ’’लखपति दीदी योजना’’ भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। इस योजना के माध्यम से स्व-सहायता समूहों से जुड़ी महिलाएं आज सफल उद्यमी बन रही हैं। जिले की चीचा ग्राम पंचायत की दुर्गा पटेल इसका प्रेरणादायक उदाहरण हैं। स्व-सहायता समूह से जुड़ने के बाद उन्हें विभिन्न कौशल प्रशिक्षण प्राप्त हुए, जिसके बाद उन्होंने घर पर ब्यूटी पार्लर का कार्य शुरू किया। साथ ही पशु सखी के रूप में भी कार्य करते हुए पशुओं के टीकाकरण और देखभाल से आय अर्जित कर रही हैं। इसके अलावा अपने घर की बाड़ी में सब्जी उत्पादन से भी उन्हें नियमित आमदनी हो रही है। इन सभी गतिविधियों से उन्होंने अपने परिवार की आर्थिक स्थिति को मजबूत किया और आज वे “लखपति दीदी” के रूप में पहचान बना चुकी हैं।
इसी तरह ग्राम नगपुरा की सरस्वती सिन्हा की कहानी भी प्रेरणादायक है। पहले वे केवल घरेलू कार्यों तक सीमित थीं, लेकिन स्व-सहायता समूह से जुड़ने के बाद उन्होंने सिलाई और ब्यूटी पार्लर का कार्य शुरू किया। आज वे स्वयं प्रशिक्षित होकर अन्य महिलाओं को भी प्रशिक्षण दे रही हैं और प्रतिमाह अच्छी आमदनी अर्जित कर रही हैं। उनकी सफलता ने आसपास की महिलाओं को भी आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रेरित किया है।
पाटन विकासखंड के असोगा गांव की मंजू अंगारे आज “लड्डू वाली दीदी” के नाम से प्रसिद्ध हैं। स्व-सहायता समूह से जुड़कर उन्होंने लड्डू बनाने का व्यवसाय शुरू किया। शुरुआत में वे अपने गांव की दुकानों के लिए लड्डू बनाती थीं, लेकिन धीरे-धीरे आसपास के गांवों से भी ऑर्डर मिलने लगे। आज वे विभिन्न प्रकार के लड्डू बनाकर हर महीने 15 से 20 हजार रुपये तक की आय अर्जित कर रही हैं और “लखपति दीदी” बन चुकी हैं।
दुर्ग जिले के आमटी गांव की केतकी बाई पटेल ने भी मेहनत और संकल्प के बल पर अपनी अलग पहचान बनाई है। बिहान योजना के माध्यम से स्व-सहायता समूह से जुड़कर उन्होंने सब्जी उत्पादन शुरू किया। आधुनिक खेती तकनीकों को अपनाते हुए उन्होंने अपने खेत में विभिन्न प्रकार की सब्जियों का उत्पादन किया। आज उनकी सब्जियों की अच्छी मांग है और वे सप्ताह में कई दिन बाजार में बिक्री कर हर महीने लगभग 32 हजार रुपये तक की आय अर्जित कर रही हैं। उनकी मेहनत से उनके परिवार की आर्थिक स्थिति में उल्लेखनीय सुधार आया है और वे अन्य महिलाओं के लिए प्रेरणा बन गई हैं।
ग्राम रिसामा की खेमीन निर्मलकर ने भी स्व-सहायता समूह के माध्यम से नया व्यवसाय शुरू कर सफलता हासिल की। उन्होंने बैंक से ऋण लेकर सेट्रिंग प्लेट उपलब्ध कराने का कार्य प्रारंभ किया, जो निर्माण कार्यों में उपयोग की जाती हैं। आज उनकी प्लेट्स कई ग्रामीण आवासों और निजी निर्माण कार्यों में उपयोग हो रही हैं, जिससे उन्हें अच्छी आमदनी हो रही है और वे क्षेत्र की महिलाओं के लिए प्रेरणा बन चुकी हैं।
इसी प्रकार भिलाई चरौदा क्षेत्र की महिलाओं ने भी स्व-सहायता समूह बनाकर सब्जी उत्पादन का कार्य शुरू किया और सामूहिक प्रयास से आर्थिक आत्मनिर्भरता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बढ़ाया। वहीं ग्राम बोरीगारका की पुष्पा साहू ने समूह के माध्यम से अचार, पापड़, मोमबत्ती, दीया और केक बनाने का व्यवसाय शुरू किया। उनके उत्पाद अब विभिन्न जिलों तक पहुंच रहे हैं और इससे उन्हें सालाना अच्छी आमदनी प्राप्त हो रही है। वे स्वयं प्रशिक्षण लेकर अन्य महिलाओं को भी स्वरोजगार के लिए प्रेरित कर रही हैं। इन सफलताओं के पीछे स्व-सहायता समूहों की महत्वपूर्ण भूमिका है। समूहों के माध्यम से महिलाओं को बचत, ऋण, प्रशिक्षण और विपणन के अवसर मिलते हैं, जिससे वे छोटे-छोटे व्यवसाय शुरू कर आर्थिक रूप से सशक्त बन रही हैं।
इसी क्रम में मतवारी गांव की ड्रोन दीदी जागृति साहू की कहानी संघर्ष, आत्मविश्वास और नई संभावनाओं की प्रेरक मिसाल है। दो विषयों में पोस्टग्रेजुएट और बी.एड. होने के बावजूद शिक्षक बनने का सपना पूरा न हो पाने से वे निराश हो गई थीं, लेकिन परिवार के सहयोग से उन्होंने मशरूम की खेती शुरू की और अपनी मेहनत से इसे एक सफल व्यवसाय में बदल दिया। शासन की योजनाओं का लाभ लेकर उन्होंने अपनी पहचान और मजबूत बनाई। मशरूम उत्पादन में उल्लेखनीय सफलता के कारण उन्हें “मशरूम लेडी ऑफ दुर्ग” के नाम से पहचान मिली। बाद में उन्होंने नमो ड्रोन दीदी पहल के अंतर्गत ड्रोन संचालन का प्रशिक्षण प्राप्त कर प्रमाणित ड्रोन पायलट के रूप में कार्य करना शुरू किया। आज वे खेतों में ड्रोन के माध्यम से दवाइयों का छिड़काव कर किसानों की मदद कर रही हैं और अन्य महिलाओं को भी प्रशिक्षण देकर आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रेरित कर रही हैं।
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छत्तीसगढ़ सरकार की अन्य योजनाएं- ’’मुख्यमंत्री कन्या विवाह योजना’’, ’’नोनी सुरक्षा योजना’’, ’’महिला कोष ऋण योजना’’, ’’सक्षम योजना’’ और केन्द्र की ’’प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना’’ जैसी योजनाएं भी महिलाओं को सामाजिक और आर्थिक रूप से मजबूत बनाने में अहम भूमिका निभा रही हैं। मुख्यमंत्री कन्या विवाह योजना गरीब परिवारों की बेटियों के विवाह में आर्थिक सहयोग प्रदान करती है। नोनी सुरक्षा योजना बालिकाओं के उज्ज्वल भविष्य के लिए आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित करती है। महिला कोष ऋण योजना और सक्षम योजना के माध्यम से महिलाओं को व्यवसाय शुरू करने के लिए आसान ऋण उपलब्ध कराया जा रहा है। वहीं प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना के माध्यम से गर्भवती महिलाओं को स्वास्थ्य और पोषण के लिए प्रोत्साहन राशि प्रदान की जाती है।
ग्रामीण महिलाओं को शासन की योजनाओं से जोड़ने और उन्हें आत्मनिर्भर बनने हेतु प्रेरित करने के उद्देश्य से पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग द्वारा राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन (बिहान) के अंतर्गत 31 अगस्त 2025 को विशेष रेडियो कार्यक्रम “दीदी के गोठ” की शुरुआत की गई। इस कार्यक्रम का प्रसारण प्रदेश के सभी आकाशवाणी केंद्रों से किया गया। इस पहल का उद्देश्य स्व-सहायता समूहों से जुड़ी सफल महिलाओं की प्रेरणादायी कहानियों को गांव-गांव तक पहुंचाना, महिलाओं को स्वरोजगार और आजीविका के अवसरों के प्रति जागरूक करना तथा उन्हें शासन की विभिन्न योजनाओं से जोड़ना है। रेडियो के माध्यम से प्रसारित होने वाला यह कार्यक्रम ग्रामीण महिलाओं में आत्मविश्वास बढ़ाने, उन्हें आर्थिक रूप से सशक्त बनाने और समाज में उनकी सक्रिय भागीदारी को प्रोत्साहित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
इन प्रयासों का परिणाम यह है कि महिलाएं केवल लाभार्थी नहीं रह गई हैं, बल्कि वे आर्थिक विकास की भागीदार बन रही हैं। महिलाएं रोजगार सृजित कर रही हैं, नए व्यवसाय शुरू कर रही हैं और समाज में आत्मनिर्भरता की नई मिसाल कायम कर रही हैं। अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर यह कहा जा सकता है कि छत्तीसगढ़ की महिलाएं अब सशक्तिकरण की नई कहानी लिख रही हैं। शासन की पहल और योजनाएं उन्हें अवसर प्रदान कर रही हैं और वे अपनी मेहनत, लगन और आत्मविश्वास से उन अवसरों को सफलता में बदल रही हैं।