
बधरी ताती बनीं ‘लखपति दीदी’ और गांव की प्रेरणा
समूह से जुड़ने से बदली जिंदगी
रायपुर। बीजापुर जिले से लगभग 20 किलोमीटर दूर नियद नेल्लानार क्षेत्र के ग्राम पालनार में रहने वाली श्रीमती बधरी ताती ऋण लेकर एक छोटी सी दुकान से शुरू करने का ये सफर आज बकरी पालन, मुर्गीपालन और सब्जी की खेती तक पहुंच चुकी है। बधरी ताती को आर्थिक स्वतंत्रता तो मिली ही साथ ही बच्चों को भी बेहतर शिक्षा दिला रही हैं।


बीजापुर जिले के नियद नेल्लानार क्षेत्र के ग्राम पालनार में रहने वाली श्रीमती बधरी ताती की कहानी मेहनत, हिम्मत और अवसर मिलने पर जीवन बदलने की मिसाल बन गई है। कभी उनका जीवन केवल घर के काम और खेती तक सीमित था। परिवार की आय के लिए वे पूरी तरह अन्य सदस्यों पर निर्भर थीं और बढ़ते खर्चों के कारण घर चलाना भी मुश्किल हो जाता था। नक्सल प्रभावित क्षेत्र होने के कारण पालनार गांव तक पहुंचना आसान नहीं था। लंबे समय तक यहां के ग्रामीणों को शासकीय योजनाओं की जानकारी भी नहीं मिल पाती थी और खेती तथा वनोपज से मिलने वाली उपज का उचित लाभ भी नहीं मिल पाता था।

बदलाव की शुरुआत तब हुई, जब उनका गांव नियद नेल्ला नार योजना के अंतर्गत चयनित हुआ और गांव में प्रशासन द्वारा शिविर आयोजित किए गए। इन शिविरों के माध्यम से ग्रामीणों तक शासकीय योजनाओं की जानकारी पहुंचने लगी। इसी दौरान छत्तीसगढ़ राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन (बिहान) के तहत महिलाओं के स्वयं सहायता समूह बनाए गए। गांव की 10 महिलाओं ने मिलकर पूजा स्व सहायता समूह का गठन किया, जिसमें बधरी ताती भी शामिल हुईं।
समूह से जुड़ने के बाद बधरी दीदी को चक्रिय निधि के रूप में 1500 रुपए तथा बैंक लिंकेज के माध्यम से 3000 रुपए का ऋण मिला। बाद में उन्हें 5000 रुपए का मुद्रा ऋण भी प्राप्त हुआ। इस राशि से उन्होंने अपने घर पर एक छोटा-सा किराना दुकान शुरू किया। धीरे-धीरे मेहनत और लगन से उन्होंने अपने काम का विस्तार किया। आज बधरी दीदी कई अलग-अलग कार्यों से आय अर्जित कर रही हैं। उन्हें निजी खेती और सब्जी उत्पादन से लगभग 6,200 रुपए, बकरी और मुर्गी पालन से लगभग 20,000 रुपए, वनोपज जैसे तेंदूपत्ता, महुआ और टोरा से करीब 30,000 रुपए तथा किराना दुकान से लगभग 16,000 रुपए की आय प्राप्त हो रही है।
प्रशासन और स्वयं सहायता समूह के सहयोग से बधरी दीदी ने अपने परिवार की आर्थिक स्थिति को मजबूत किया है। आज उनका परिवार पहले से बेहतर जीवन जी रहा है और गांव में उन्हें सम्मान के साथ ‘लखपति दीदी’ के रूप में जाना जाता है। बधरी दीदी भावुक होकर कहती हैं कि समूह से जुड़ने के बाद मेरे जीवन को नई दिशा मिली है। पहले मैं सिर्फ घर के काम तक सीमित थी, लेकिन अब अपने पैरों पर खड़ी हूं। समूह ने मुझे आर्थिक सहयोग के साथ-साथ आत्मविश्वास भी दिया है। अब मैं गांव की अन्य महिलाओं को भी आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रेरित करती हूं।
आज बधरी दीदी की सफलता यह संदेश देती है कि यदि सही मार्गदर्शन और सरकारी योजनाओं का लाभ मिले, तो दूरस्थ और चुनौतीपूर्ण क्षेत्रों में रहने वाली महिलाएं भी अपने जीवन को बदल सकती हैं और समाज के लिए प्रेरणा बन सकती हैं।