
नई दिल्ली / तेलंगाना के सीएम के चंद्रशेखर राव इन दिनों अचानक भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ मुखर हो गए हैं. हाल ही में उन्होंने सर्जिकल स्ट्राइक पर कांग्रेस नेता राहुल गांधी का समर्थन करते हुए सबूत की मांग को जायज ठहराया था. केसीआर का बीजेपी पर पहली बार यह सीधा हमला था.
इस हमले के पीछे उनकी साफ मंशा थी. वे यह जताना चाहते हैं कि पीएम नरेंद्र मोदी और भाजपा पर तीखी आलोचना करने में अब वे पीछे नहीं रहने वाले हैं. हैरानी की बात है कि सिर्फ एक महीना पहले तक केसीआर भाजपा के साथ अपने रिश्ते को संतुलित बनाए हुए थे. उनकी पार्टी राष्ट्रीय मुद्दे पर अक्सर भाजपा का साथ देती रही है.
फिर अचानक ऐसा क्या हो गया कि केसीआर ने अपनी दिशा बदल ली. विश्लेषक मानते हैं कि इसके पीछे केसीआर का एक गेम प्लान है जिसे वे भाजपा की ओर से आ रही संभावित चुनौती के मद्देनजर बनाना चाहते हैं. केसीआर ने नोटबंदी, तीन तालाक जैसे मुद्दे पर संसद में भाजपा का साथ दिया है.
पिछली बार राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनाव में भी केसीआर की पार्टी ने भाजपा के साथ थी. पर अब उनकी मंशा बदल चुकी है. हालांकि तेलंगाना में वे और उनकी पार्टी टीआरएस के नेता बीजेपी के खिलाफ आक्रामक रहेंगे लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह से निपटने में वे राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य को देखते हुए संयम और विवेक से काम लेंगे.
तेलंगाना में बीजेपी से मिल रही मजबूत चुनौती
दरअसल, के चंद्रशेखर राव यूं ही नहीं अचानक बीजेपी के खिलाफ हुए हैं. इसके पीछे कई वाजिब वजहे हैं. पिछले कुछ सालों से बीजेपी तेलंगाना में केसीआर की पार्टी टीआरएस के लिए मजबूत चुनौती बनकर उभरी है. 2018 के तेलंगाना विधाननसभा चुनाव में बीजेपी को सिर्फ 7 प्रतिशत वोट मिले थे लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में तेलंगाना में बीजेपी को 20 प्रतिशत वोट मिले. इतना ही नहीं राज्य में हुए उप चुनाव में बीजेपी ने दो सीटों पर कब्जा जमा लिया.
केसीआर के लिए हुजराबाद की सीट ने विशेष रूप से आहत किया क्योंकि वहां से उनकी ही पार्टी के पूर्व नेता एताला राजेंद्र ने टीआरएस को हरा दिया. जिस तरह हैदराबाद नगर निगम चुनाव में बीजेपी के बड़े-बड़े नेता चुनाव प्रचार में उतर गए, वह केसीआर के लिए सीधी चुनौती थी.
इसका नतीजा यह हुआ कि टीआरएस 99 से 56 सीटों पर सिमट गई. नगर निगम में 150 सीटें हैं लेकिन यह तेलंगाना के 119 में 25 विधानसभा सीटों को प्रभावित करती है. बीजेपी के तेलंगाना में इस उभार को केसीआर सीधे अपने लिए चुनौती मानते हैं. राज्य में 2023 में विधानसभा चुनाव होना है और केसीआर को लगता है कि बीजेपी उनके लिए सिरदर्द साबित हो सकती है.
गैर-भाजपा राज्यों के साथ केसीआर
विश्लेषकों के मुताबिक पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव के बाद भाजपा का ध्यान तेलंगाना की ओर जाएगा. इस बात को भांपते हुए केसीआर बीजेपी के खिलाफ अपना गेम प्लान बना रहे हैं. इसमें पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी उनका साथ दे रहीं हैं.
सोमवार को उन्होंने ट्वीट कर इस बात की जानकारी दी थी कि राज्य में गवर्नर के साथ उनके संघर्ष को लेकर तेलंगाना के मुख्यमंत्री केसीआर और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम के स्टालिन से बात हुई. ममता बनर्जी दिल्ली में गैर-भाजपा शासित मुख्यमंत्रियों की बैठक बुलाना चाहती हैं.
इस बैठक में के चंद्रशेखर राव सहित एम के स्टालिन, उद्धव ठाकरे, हेमंत सोरेन, पिनाराई विजयन के पहुंचने की संभावना है. 10 मार्च को विधानसभा चुनाव के परिणाम आ जाने के बाद बैठक की तिथि की घोषणा हो सकती है.
केसीआर की राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा
टीओआई की खबर में छपी रिपोर्ट के मुताबिक राजनीतिक विश्लेषक के नागेश्वर कहते हैं, बीजेपी के खिलाफ मुखर होने की दो प्रमुख वजहें हैं. एक तो तेलंगाना में बीजेपी ने धीरे-धीरे नंबर दो की पोजिशन को कांग्रेस से छीन लिया है जो टीआरएस के लिए मुख्य चुनौती बनती जा रही है.
दूसरा केसीआर अब राष्ट्रीय राजनीति पर अपनी भूमिका बढ़ाना चाहते हैं. राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक तेलंगाना के मुख्यमंत्री इसी महत्वाकांक्षा के साथ गैर-भाजपा और गैर-कांग्रेसी दलों के साथ संघीय मोर्चे पर काम करना शुरू कर दिया है.
उनकी चाहत है कि सभी क्षेत्रीय दलों – जैसे टीएमसी, डीएमके, शिवसेना, जद (एस), राजद और समाजवादी पार्टी एक मंच पर आए और भाजपा को टक्कर दें. हाल ही में हैदराबाद में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में केसीआर ने खुले तौर पर राष्ट्रीय राजनीति में भूमिका निभाने की इच्छा व्यक्त की है.



