
Publish Date: | Sat, 30 Oct 2021 09:10 PM (IST)
Chhatisgarh Tribal Festival: रायपुर (नईदुनिया प्रतिनिधि)। छत्तीसगढ़ के राजधानी रायपुर में तीन दिवसीय राष्ट्रीय ट्राइबल फेस्टिवल का शनिवार को समापन हो गया। अपने-अपने राज्य की संस्कृति के अनुरूप पारंपरिक पोषाक, आभूषण, मोर पंख से बने मुकुट, जंवारा कलश, तीर-कमान, ढोल, मंजीरा, चंग, मृदंग जैसे अनेक वाद्य यंत्रों के साथ प्रस्तुति देकर 27 राज्यों, छह केंद्र शासित प्रदेश और सात देशों के आदिवासियों ने मन मोह लिया। सुबह से रात तक छत्तीसगढ़ के हुए प्रस्तुतियों को दर्शकों ने जमकर सराहा। कई प्रस्तुतियां देखकर लोग अचंभित भी रह गए। अलग-अलग राज्यों की आदिवासी संस्कृति से रू-ब-रू हुए। प्रस्तुति देने आए आदिवासी अपने साथ मीठी यादें सहेजकर ले गए। प्रदेशवासियों ने भी हर दल के साथ सेल्फी लेकर यादों को सहेजा।छत्तीसगढ़िया सब-ले, बढ़ियाआपसी प्रेम, सद्भावना का संदेश देते हुए आदिवासियों ने प्रस्तुति देने के बाद मंच से ही छत्तीसगढ़िया सब-ले बढ़िया का नारा लगाकर आपसी प्रेम, सद्भावना का संदेश दिया। आदिवासी महोत्सव को देखने आए अनेक अतिथियों के साथ युवा ऋत्विक राठौर, गौरव जैन, प्रखर शर्मा, अनुराग, मेघा, रोशनी ने आयोजन की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे भव्य आयोजन और विविध लोक कला नृत्य को वे कभी भूल नहीं पाएंगे। ऐसे आयोजन साल में एक बार तो होने ही चाहिए। इससे सभी राज्यों के लोगों को एक-दूसरे की संस्कृति को जानने-समझने का मौका मिलता है।फसल कटाई, विवाह, त्योहार, पौराणिक आख्यानों की झलक तीसरे और अंतिम दिन अनेक राज्यों के लोक नर्तक दलों ने फसल कटाई, विवाह, पर्व-त्योहार के मौके पर किए जाने वाले नृत्यों की प्रस्तुति देकर मन मोह लिया। एक प्रस्तुति ऐसी भी हुई, जिसमें मृत्यु संस्कार के मौके पर नृत्य किया जाता है। दर्शक एकटक होकर नृत्य का आनंद लेते रहे। लोक नर्तक दलों की प्रतियोगिता में प्रथम प्रस्तुति तमिलनाडु की हुई। कोथा के नाम से प्रसिद्ध नृत्य हर पर्व, त्योहार, पारिवारिक खुशियों के मौके पर किया जाता है। इसमें सफेद कुर्ता, सफेद लुंगी वाली पोशाक धारणकर धीरे-धीरे पुरुष नर्तकों ने प्रस्तुति दी।महाराष्ट्र का लिंगो नृत्यमहाराष्ट्र के गढ़चिरौली के आसपास मृत्यु संस्कार के दौरान किया जाने वाला लिंगो नृत्य पेश किया गया। आदिवासी मानते हैं कि मृत्यु के बाद उनके स्वजन देवता बन जाते हैं। यह पहली ऐसी प्रस्तुति रही, जिसमें खुशी नहीं, गम के मौके पर किए जाने वाले नृत्य की प्रस्तुति हुई। दमन द्वीप, दादरा के कलाकारों ने फसल बोने से पहले देवताओं का आह्वान करने वाला तारपा नृत्य प्रस्तुत किया।मेघालय का वांगला नृत्यकारो जनजाति का वांगला नृत्य कृषि कार्य के दौरान किया जाता है। इस जनजाति के लोग अपने आराध्य देव सूर्य को मिसि साल देव के रूप में पूजते हैं। यह नृत्य अक्टूबर से नवंबर तक किया जाता है। वहीं छत्तीसगढ़ का उरांव कर्मा नृत्य की प्रस्तुति दी। कर्नाटक की बंजारा जाति की महिलाओं ने परिवार, समाज की रक्षा के लिए देवताओं का आह्वान करते हुए पूजा करते का लम्बाड़ी नृत्य प्रस्तुत किया।लक्षद्वीप का बंदिया नृत्यएक समान आयु वर्ग की युवतियां, शादी के मौके पर नृत्य कर खुशियां मनाती हैं। हाथों में मिट्टी का घड़ा लेकर परिवार में शीतलता का संदेश देती है। शादी से पहले मिट्टी का घड़ा लेकर नाचती हैं और जब ससुराल के लिए विदा होती हैं तो धातु का घड़ा परिवार वाले दुल्हन के साथ भेजते हैं। घड़ा और युवती दो परिवारों के बीच आपसी संबंधों को मजबूत करने और जोड़ने के प्रतीक हैं। इसे नृत्य के जरिए दिखाया गया। इसके अलावा अंडमान निकोबार का निकोबार का निकोबारी नृत्य, राजस्थान का सहारिया स्वांग नृत्य,गुजरात का वसावा होली नृत्य,झारखंड का झाउ नृत्य, पश्चिम बंगाल का संथाली नृत्य व ओडिशा का धप नृत्य भी आकर्षण का केंद्र रहा।
Posted By: Ravindra Thengdi



