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पटना में विपक्षी दलों की एकता 2024 की लोकसभा चुनाव में सत्ता परिवर्तन के संकेत दिया।

2024 में लोकसभा चुनाव होगा, यह तो अभी निश्चित है लेकिन परिणाम महागठबंधन के पक्ष में हो तो ठीक अन्यथा यह कयास लगाया जा रहा है कि मोदी राज 2024 लोकसभा चुनाव में यदि पुनः सत्ता पर काबिज हुई तो भविष्य में चुनाव प्रक्रिया को ही समाप्त कर देगा। महागठबंधन को ध्यान आकृष्ट करना होगा कि राज्य अगर जीते हो तो क्या हो, तुम्हे तो केंद्रीय सरकार बनाना होगा, और इसके लिए ईवीएम मशीनों से चुनाव ना कर बैलेट पेपर पर चुनाव कराना होगा…..

पटना। देश की दशा, दिशा, राष्ट्रीय संसाधन, संपत्ति, संविधान और सरकारी अंगो का दोहन कर एक पक्षीय शासन करने की मनःस्थिति पाली तानाशाही सरकार के खिलाफ पटना में विपक्षी दलों का वाकई महाजुटान हो गया। एक अच्छी और अद्भुत शुरुआत हो गई, जिसकी कल्पना खुद गैर भाजपाई मतदाताओं को नहीं थी। लेकिन वैसी एकता धरातल पर लाने की शुरुआत तो हो गई है, जिससे वाकई देश विक्रेता गैंग में खलबली मच गई है। यह वाक्य में कहें तो 18 दलों की महा बैठक बिल्कुल हिट हो गई।जानकार एवं तटस्थ लोगों का भी कहना है कि इस बार सभी गैर भाजपा नेताओं और दलों ने बिल्कुल समझदारी और मजबूती के साथ अपना कदम उठाया है। सब लोग एक निश्चित एजेंडा के तहत एकजुट हो गए हैं। यह उनके अस्तित्व का सवाल था । इसलिए यह एकता हर सूरत में बनी रहेगी। सभी दलों के अधिकतर शीर्ष नेताओं को झूठे केस में फंसाना, गिरफ्तार करना , छापेमारी से सारे दल कितने त्रस्त हैं कि वह भगाए जाने पर भी इस एकता को नहीं छोड़ेंगे । यह एकता जीवन मरण के सवाल के जैसा बेहद ज्वलंत एवं अनिवार्य बन गया है। केंद्र सरकार खासकर नरेंद्र मोदी की हिटलर शाही आचरण के कारण सभी तरह के मध्यमार्गी और वामपंथी दल एकजुट हो गए हैं, क्योंकि उन्हें लोकतंत्र और संविधान के खात्मे का स्पष्ट खतरा दिखाई दे रहा है। भारतीय लोकतंत्र पर कब्जा कर उसे समाप्त कर देने वाले तत्वों से बचने के लिए ऐसी एकजुटता अनिवार्य हो गई थी, जिसे अब साकार किया गया है। इस गोलबंदी से 68 से 70% वोटों की गोलबंदी का रास्ता साफ हो गया है । निकट भविष्य में भाजपा के आधार भूत वोटों को छोड़कर शेष सभी वोटों के पूरी तरह क्षरण हो जाने की गारंटी बन गई है। कल जो पटना में अभूतपूर्व महा जुटान हुआ था, उसमें शामिल कश्मीर से कन्याकुमारी तक के प्रायः सभी प्रमुख पार्टीयो के शामिल दलों के बीच वाकई 98 प्रतिशत मुद्दों पर एकता अंततः हो गई। सर्वानुमति बनी कि भाजपा के खिलाफ 2024 में सब मिलकर चुनाव लड़ेंगे। विचारधारा के स्तर पर जो भी आपस के मतभेद हैं, वो दरकिनार करके सब मिलजुलकर लड़ेंगे। यह तो क्लियर हो गया कि जो यह भविष्यवाणी कर रहे थे कि विपक्षी एकता किसी सूरत में नहीं होगी , उनके गाल पर करारा तमाचा लग गया । तमाम आशंकाओं के विपरीत कांग्रेस ने बैठक में बड़े भाई के जैसा बड़ा दिल दिखाया और सबसे अधिक कुर्बानी देने की बात भी कह दी , उससे छोटे दलों से दोनों के बीच खुशी की लहर दौड़ गई । कांग्रेस ने एक तरह से साफ कर दिया कि वह अधिक सीटों पर लड़ने के मामले में कोई जिद नहीं करेगी। उसका त्याग और समर्पण देश एवं संविधान बचाने को फोकस करके रहेगा। इससे हर तरह की आशंका खत्म हो गई। बैठक में पूरे देश में हर लोकसभा में भाजपा के खिलाफ विपक्ष का एक साझा उम्मीदवार दिए जाने पर सहमति बनी। विपक्षी एकजुटता को कोई मोर्चा का रूप देकर नामकरण कर दिया जाएगा, जिसके संयोजक नीतीश कुमार बनाये जा सकते हैं। यह दायित्व 12 जुलाई को उनकी वरिष्ठता तथा अनुभव को देखते हुए दिया जा सकता है। तटस्थ प्रेक्षकों का भी आकलन है कि अब कोई अड़चन कहीं नहीं है। यह राहुल गांधी, खड़गे ,लालू यादव, ममता ,अखिलेश स्टालिन सहित सभी 28 प्रमुख नेताओं ने बड़े ही साफगोई से कह दिया । एक संकल्प मीडिया के सामने भी व्यक्त कर दिया गया। सभी ने कहा दल नहीं, दिल मिल रहे हैं। इस विपक्षी एकता के शिल्पकार तो वास्तव में लालू, सोनिया, राहुल के अलावा खास तौर पर नीतीश कुमार रहे। नीतीश , लालू तो महीनों से इस प्रयास में लगे रहे। बीमारी के बावजूद सारी चीजों की मानिटरिंग करते रहे । सब को फोन करके दुलारा , मनाया, बुलाया और पूरी व्यवस्था की देखरेख करते रहे। नीतीश को भी जागृत किया। खुद कोई क्रेडिट नहीं ली। यह उनके अनुभवी प्रयासों का ही असर था कि ममता, वामदल, कांग्रेश सभी दल अपना मत भेद और ईगो छोड़कर यहां पहुंच गए। उनकी सारी कवायद, सारी तपस्या 23 जून को मूर्तरूप में सामने आई। ऐसा लगा कि जयप्रकाश नारायण के चेलों में लड़ाई का माद्दा बचा हुआ है । उनकी दी हुई आंदोलनकारी शिक्षा उनके शिष्यों के समझ में है और उसी तालिम को वे धरातल पर उतार रहे हैं। एक अखाड़े में इतने पहलवानों को लाना वाकई कठिन काम था। लेकिन स्वर्गीय जयप्रकाश नारायण और लोहिया के विचारों का गहरा असर था, जिस के चलते ये लोग फिर इस महा तानाशाही के खिलाफ जान का खतरा उठा कर भी खड़े हो गए। यह साधारण बात नहीं कि बिभिन्न विचारधारा के लोगों को एक मंच पर लाना , विपक्षी एकता को तैयार करना और उसमें संजीदगी से जान डालना। प्राण डालना और उसे गतिशील करना। ममता बनर्जी, महबूबा मुफ्ती ,उमर अब्दुल्ला, स्टालिन, अखिलेश, हेमंत सोरेन आदि तमाम नेता जिस जोश और इंवॉल्वमेंट के साथ बैठक में भागीदारी कर रहे थे , उससे साफ लग रहा था कि निर्णायक महाभारत युद्ध के लिए इधर से भी सारे योद्धा तैयार हैं। एकजुटता के लिए यह सब कुछ देखना, सुनना अद्भुत था। लोकसभा चुनाव के पहले जैसी एकजुटता बननी चाहिए थी उसकी आज वह नींव पड़ गई । जिसका अभाव 2019 के लोकसभा चुनाव में था। पर अब तमाम दल मिलकर गम्भीर चुनौती पेश करेंगे। भाजपा जितनी डींगे हांक ले पर उनके लिए 2024 चुनाव आसान नहीं रहा। अब शिमला में यह भी तय हो जाएगा कि नए मोर्चे का नाम क्या होगा और कौन इसके पदाधिकारी होंगे साथ ही सीट शेयरिंग का फॉर्मूला भी तय होगा। हर लोकसभा पर बारीकी से मंथन होगा। कौन दल , किस राज्य में किस लोकसभा सीट से लड़ेगा । यह भी तय होगा यानी हर चीज का ब्लूप्रिंट तैयार हो जाए। अब विपक्षी दलों को नये पेगासस जासूसी सॉफ्टवेयर से बचने से लेकर ईवीएम की अदला बदली, उसके फर्जीवाड़े , प्रीलोडेड मशीनों के उपयोग से बचने के लिए ठोस रणनीति बनानी होगी। सरकारी मशीनरी, भगवा मानसिकता वाले सरकारी अफसरों पर भी कड़ी निगाह रखनी होगी और जनता के सहयोग से उनकी पूर्ण घेराबंदी करनी होगी, तभी विजय निश्चित है। 19 लाख गायब ईवीएम बिल्कुल खतरे की घंटी हैं। बैलेट पेपर से चुनाव का मुद्दा विपक्षी दलों को नहीं छोड़ना चाहिए। वैसे अब सभी दलों को भाजपा के शतरंजी चालों से सावधान रहना होगा। धूर्तता पूर्ण अफवाहों से ही सावधान रहना होगा । एकता में दरार लाने के तमाम खेल तमाशे, खरीद बिक्री के बीच भी अपने निष्ठा और चरित्र को मजबूत बनाए रखना होगा यानि किसी भी तरह के झांसे या लाली पॉप में नहीं फंसना होगा।

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